बीजेपी राज में राजद्रोह के 326 केस दर्ज, सिर्फ़ छह में दोषी करार: गृह मंत्रालय के आंकड़े
बीजेपी राज में राजद्रोह के 326 केस दर्ज, सिर्फ़ छह में दोषी करार: गृह मंत्रालय के आंकड़े
राजद्रोह क़ानून के तहत 2014-19 के बीच
2019 में देश में राजद्रोह के सबसे ज्यादा 93 मामले दर्ज किए गए. वर्ष 2018 में, ऐसे 70 मामले दर्ज किए गए, उसके बाद 2017 में 51, 2014 में 47, 2016 में 35 और 2015 में 30 मामले दर्ज किए गए.

नई दिल्ली(Agency)औपनिवेशिक काल के विवादास्पद राजद्रोह कानून यानी भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 124ए के तहत देश में साल 2014 से 2019 के बीच कुल 326 मामले दर्ज किए गए, जिनमें सिर्फ छह लोगों को दोषी ठहराया गया.
केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2014 और 2019 के बीच राजद्रोह कानून के तहत कुल 326 मामले दर्ज किए गए. इनमें सबसे ज्यादा असम में 54 मामले दर्ज किए गए.
अधिकारियों ने बताया कि दर्ज मामलों में से 141 मामलों में आरोप-पत्र (Charge-Sheet) दाखिल किए गए, जबकि छह साल की अवधि में केवल छह लोगों को अपराध के लिए दोषी करार दिया गया.
आंकड़ों के मुताबिक, असम में दर्ज किए गए 54 मामलों में से 26 मामलों में आरोप-पत्र दाखिल किए गए और 25 मामलों में मुकदमा पूरा हो गया. हालांकि, 2014 और 2019 के बीच एक भी मामले में दोष सिद्ध नहीं हुआ.
झारखंड ने छह वर्षों के दौरान धारा 124 (ए) के तहत 40 मामले दर्ज किए, जिनमें से 29 मामलों में आरोप-पत्र दाखिल किए गए और 16 मामलों में मुकदमा पूरा हो गया. राज्य में दर्ज इन सभी मामलों में से केवल एक व्यक्ति को दोषी ठहराया गया.
हरियाणा में राजद्रोह कानून के तहत 19 मामलों में आरोप-पत्र दाखिल करने के साथ 31 मामले दर्ज किए गए और छह मामलों में सुनवाई पूरी हुई. यहां भी सिर्फ एक व्यक्ति को दोषी ठहराया गया. बिहार, जम्मू कश्मीर और केरल में राजद्रोह कानून के तहत 25-25 मामले दर्ज किए.
उत्तर प्रदेश में 2014 से 2019 के बीच 17 और पश्चिम बंगाल में राजद्रोह के आठ मामले दर्ज किए गए. उत्तर प्रदेश में आठ मामलों में और पश्चिम बंगाल में पांच मामलों में आरोप-पत्र दाखिल किए गए, दोनों राज्यों में किसी को भी दोषी नहीं ठहराया गया था.
इस अवधि में दिल्ली में चार मामले दर्ज किए गए. किसी भी मामले में आरोप-पत्र दाखिल नहीं हुआ और न ही किसी को दोषी ठहराया गया.
छह साल की अवधि में मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा, सिक्किम, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, लक्षद्वीप, पुदुचेरी, चंडीगढ़, दमन और दीव तथा दादरा और नगर हवेली में राजद्रोह का कोई मामला दर्ज नहीं किया गया.
महाराष्ट्र (2015 में), पंजाब (2015), और उत्तराखंड (2017) में राजद्रोह का एक-एक मामला दर्ज किया गया था.
गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 2019 में देश में राजद्रोह के सबसे ज्यादा 93 मामले दर्ज किए गए. वर्ष 2018 में, ऐसे 70 मामले दर्ज किए गए, उसके बाद 2017 में 51, 2014 में 47, 2016 में 35 और 2015 में 30 मामले दर्ज किए गए.

देश में 2019 में राजद्रोह कानून के तहत चार, 2018 में 38, 2017 में 27, 2016 में 16, 2014 में 14 और 2015 में छह आरोप-पत्र दाखिल किए गए. साल 2014 से 2019 छह दोषियों में से दो को 2018 में और एक-एक को 2019, 2017, 2016 और 2014 में सजा मिली.
गैर-जमानती प्रावधानों के साथ इस कानून के तहत ऐसा कोई भाषण या अभिव्यक्ति, जो भारत में कानून द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घृणा या अवमानना या असंतोष को बढ़ाने का प्रयास करता है तो यह एक दंडनीय अपराध है, जिसमें अधिकतम सजा आजीवन कारावास तक हो सकती है.
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह के मामलों में सभी कार्यवाहियों पर बुधवार को रोक लगा दी और केंद्र एवं राज्यों को निर्देश दिया कि जब तक सरकार औपनिवेशिक युग के कानून पर फिर से गौर नहीं कर लेती, तब तक राजद्रोह के आरोप में कोई नई एफआईआर दर्ज न की जाए.
केंद्र ने बीते नौ मई को सुप्रीम कोर्ट से यह अनुरोध किया था कि वह राजद्रोह कानून की संवैधानिक वैधता का अध्ययन करने में समय नहीं लगाए. केंद्र सरकार ने कहा कि उसने ‘उचित फोरम’ द्वारा राजद्रोह संबंधी कानून का ‘पुन: अध्ययन और उस पर पुनर्विचार कराने’ का फैसला किया है.
केंद्र की मोदी सरकार ने बीते सात मई को सुप्रीम कोर्ट में राजद्रोह से संबंधित दंडात्मक कानून (आईपीसी की धारा 124ए) और इसकी वैधता बरकरार रखने के संविधान पीठ के 1962 के एक निर्णय का बचाव किया था. केंद्र ने यह कहते हुए कि लगभग छह दशकों से यह कानून बना हुआ है और इसके दुरुपयोग के उदाहरण कभी भी इसके पुनर्विचार का कारण नहीं हो सकते हैं.
शीर्ष अदालत राजद्रोह संबंधी कानून की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है. राजद्रोह कानून उन आरोपों के बीच विवाद के केंद्र में रहा है, जिसमें कहा गया है कि विभिन्न सरकारों द्वारा राजनीतिक दुश्मनी निपटाने के लिए इसका हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है.
इन आरोपों ने सीजेआई को यह पूछने के लिए प्रेरित किया था कि क्या स्वतंत्रता सेनानियों को दबाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले इस औपनिवेशिक युग के कानून की आजादी के 75 साल बाद भी जरूरत है.
एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, पूर्व मेजर जनरल एसजी वोम्ब टकेरे और तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा द्वारा आईपीसी की धारा 124ए (राजद्रोह) की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं की जांच करने के लिए सहमत होते हुए शीर्ष अदालत ने कहा था कि इसकी मुख्य चिंता ‘दुरुपयोग’ है, जिससे मामलों की संख्या में वृद्धि हो रही है.
