भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पत्रकारों की गिरफ्तारी और प्रेस स्वतंत्रता पर उठते सवाल

भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पत्रकारों की गिरफ्तारी और प्रेस स्वतंत्रता पर उठते सवाल

क्या भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पहले जैसी सुरक्षित है?

रिपोर्ट -राजकुमार अग्रवाल
रिपोर्ट -राजकुमार अग्रवाल

 

 

 

 

 

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। हालांकि यह अधिकार पूर्ण नहीं है; अनुच्छेद 19(2) के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, मानहानि, न्यायालय की अवमानना आदि कारणों से इस पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। असली बहस इन प्रतिबंधों के अस्तित्व पर नहीं, बल्कि उनके उपयोग और दायरे पर है।

पिछले एक दशक में भारत में पत्रकारों, स्वतंत्र मीडिया संस्थानों और मानवाधिकार संगठनों ने कई ऐसे मामलों की ओर ध्यान दिलाया है, जिनमें पत्रकारों पर आपराधिक मुकदमे, गिरफ्तारी, छापे या लंबी कानूनी प्रक्रियाएँ लागू की गईं। दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि कानून सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होता है और यदि किसी मामले में कार्रवाई हुई है तो वह उपलब्ध साक्ष्यों तथा कानून के अनुसार हुई है, न कि पत्रकारिता के कारण।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रेस स्वतंत्रता का सबसे चर्चित सूचकांक Reporters Without Borders का World Press Freedom Index है। इस सूचकांक में भारत की रैंक हाल के वर्षों में चर्चा का विषय रही है। RSF के 2025 सूचकांक में भारत 180 देशों में 151वें स्थान पर था, जबकि 2026 के सूचकांक में भारत 157वें स्थान पर दर्ज किया गया। RSF का कहना है कि वह राजनीतिक, कानूनी, आर्थिक, सामाजिक और सुरक्षा संबंधी पाँच संकेतकों के आधार पर यह रैंकिंग तैयार करता है।

RSF और अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रेस संगठनों ने भारत में कुछ पत्रकारों की गिरफ्तारी, ऑनलाइन उत्पीड़न, कानूनी मुकदमों तथा मीडिया संस्थानों पर कार्रवाई को लेकर चिंता व्यक्त की है। उनका तर्क है कि यदि पत्रकारों को आलोचनात्मक रिपोर्टिंग के कारण लंबे समय तक कानूनी दबाव झेलना पड़े, तो इससे स्वतंत्र पत्रकारिता पर “चिलिंग इफेक्ट” (भय का माहौल) पड़ सकता है।

वहीं भारत सरकार ने इन आलोचनाओं को कई अवसरों पर अस्वीकार किया है। सरकार का कहना है कि भारत में हजारों समाचार पत्र, सैकड़ों समाचार चैनल और लाखों डिजिटल मंच सक्रिय हैं, जहाँ सरकार की नियमित आलोचना होती है। सरकार का यह भी तर्क है कि किसी व्यक्ति के पत्रकार होने से उसे कानून से छूट नहीं मिलती, और यदि किसी पर कार्रवाई होती है तो वह उसके कथित आपराधिक कृत्य के आधार पर होती है, न कि उसकी पत्रकारिता के कारण।

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इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि लोकतंत्र में प्रेस की स्वतंत्रता और कानून का शासन—दोनों समान रूप से आवश्यक हैं। यदि पत्रकारों को बिना पर्याप्त आधार के निशाना बनाया जाता है, तो लोकतांत्रिक जवाबदेही कमजोर होती है। वहीं यदि किसी पत्रकार पर वास्तविक आपराधिक आरोप हैं, तो उसकी निष्पक्ष और पारदर्शी न्यायिक प्रक्रिया भी उतनी ही आवश्यक है।

इसी कारण प्रेस स्वतंत्रता का प्रश्न केवल मीडिया का मुद्दा नहीं है; यह नागरिकों के जानने के अधिकार, सरकार की जवाबदेही और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता के विश्वास से भी जुड़ा हुआ माना जाता है।

इस विषय पर “2014 के बाद भारत में गिरफ्तार, हिरासत में लिए गए या मारे गए सभी पत्रकारों, लेखकों और मीडिया कर्मियों की पूरी सूची” देना अभी संभव नहीं है, क्योंकि:

ऐसी कोई एक आधिकारिक सरकारी सूची उपलब्ध नहीं है।
अलग-अलग संस्थाओं (CPJ, RSF, International Federation of Journalists, Editors Guild of India, NCRB, राज्य पुलिस, अदालतों) के आँकड़े अलग-अलग हैं।
कई मामलों में यह विवादित है कि कार्रवाई पत्रकारिता के कारण हुई या अन्य आरोपों (UAPA, राजद्रोह, आईटी अधिनियम, मनी लॉन्ड्रिंग, हिंसा, आदि) के कारण।

इसलिए यदि मैं कोई “कुल संख्या” बता दूँ, तो उसके सही होने की गारंटी नहीं होगी।

 

नाम मीडिया संस्थान गिरफ्तारी/घटना का वर्ष आरोप/कानून कितने दिन जेल वर्तमान स्थिति
सिद्धीक़ कप्पन Azhimukham / Tejas 2020 UAPA, देशद्रोह सहित अन्य आरोप लगभग 2 वर्ष से अधिक न्यायिक हिरासत; बाद में जमानत जीवित
रूपेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार 2022 UAPA कई माह जेल जीवित
फ़हद शाह The Kashmir Walla 2022 UAPA, PSA सहित विभिन्न मामले कई महीनों तक हिरासत जीवित
आसिफ़ सुल्तान Kashmir Narrator 2018 UAPA लगभग पाँच वर्ष; बाद में रिहाई, फिर PSA जीवित
राजीव शर्मा स्वतंत्र पत्रकार 2020 Official Secrets Act कुछ माह जेल, बाद में जमानत जीवित

2014 के बाद भारत में चर्चित पत्रकार हत्याओं के कुछ प्रमुख मामलों का तथ्य-आधारित सार दिया गया है। ध्यान रहे कि हर मामले में हत्या के पीछे की मंशा, आरोपी और अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अलग-अलग हैं। इसलिए किसी भी मामले को बिना अदालत या जाँच एजेंसी के निष्कर्ष के किसी राजनीतिक दल या संगठन से जोड़ना उचित नहीं होगा।

 

पत्रकार मीडिया संस्थान मृत्यु क्या रिपोर्टिंग कर रहे थे मामले की स्थिति
राजदेव रंजन हिन्दुस्तान (सिवान ब्यूरो प्रमुख) 13 मई 2016, सिवान (बिहार) अपराध, भ्रष्टाचार और राजनीति मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने गोली मारकर हत्या की। कई आरोपियों की गिरफ्तारी हुई, मामला CBI को सौंपा गया।
संदीप कोठारी स्वतंत्र पत्रकार 20 जून 2015, मध्य प्रदेश अवैध खनन (माइनिंग) और स्थानीय भ्रष्टाचार अपहरण के बाद हत्या, शव जलाया गया। पुलिस ने खनन माफिया से जुड़े आरोपियों को गिरफ्तार किया।
गौरी लंकेश Gauri Lankesh Patrike 5 सितंबर 2017, बेंगलुरु सांप्रदायिकता, राजनीति, सामाजिक मुद्दे घर के बाहर गोली मारकर हत्या। विशेष जाँच दल (SIT) ने कई आरोपियों को गिरफ्तार किया; मुकदमा लंबित है।
शुजात बुखारी Rising Kashmir (संपादक) 14 जून 2018, श्रीनगर कश्मीर, मानवाधिकार, राजनीति कार्यालय के बाहर गोली मारकर हत्या। जाँच में आतंकवादी संगठनों की संलिप्तता का आरोप लगाया गया।
संदीप शर्मा स्थानीय टीवी पत्रकार 26 मार्च 2018, भिंड (मध्य प्रदेश) रेत (सैंड) माफिया और पुलिस-खनन संबंधी रिपोर्टिंग डंपर से कुचलकर मौत। मामले की CBI जाँच हुई; यह व्यापक सार्वजनिक बहस का विषय बना।
नवीन निश्चल दैनिक भास्कर 25 मार्च 2018, बिहार स्थानीय प्रशासन और राजनीति वाहन से कुचलकर हत्या का आरोप; कई लोगों पर मामला दर्ज हुआ।
शुभम मणि त्रिपाठी Kampu Mail 19 जून 2020, उत्तर प्रदेश स्थानीय अपराध और अवैध गतिविधियाँ गोली मारकर हत्या। पुलिस ने कई आरोपियों को गिरफ्तार किया।

यह तालिका प्रमुख और व्यापक रूप से रिपोर्ट किए गए मामलों का संक्षिप्त कालक्रम है। सभी मामलों में न्यायिक प्रक्रिया और अंतिम निष्कर्ष अलग-अलग हो सकते हैं, और कुछ मामले अभी भी लंबित हैं।

वर्ष पत्रकार हत्याएँ / हमले गिरफ्तारियाँ / UAPA / राजद्रोह / ED-CBI / पुलिस कार्रवाई इंटरनेट शटडाउन एवं प्रभाव
2014 विभिन्न राज्यों में स्थानीय पत्रकारों पर हमलों की घटनाएँ। कई राज्यों में पत्रकारों पर IPC व अन्य धाराओं के तहत मुकदमे दर्ज। जम्मू-कश्मीर सहित संवेदनशील क्षेत्रों में इंटरनेट प्रतिबंधों का उपयोग बढ़ना शुरू।
2015 जगेन्द्र सिंह, संदीप कोठारी की हत्या। स्थानीय पत्रकारों के विरुद्ध कई आपराधिक मुकदमे। कानून-व्यवस्था के नाम पर इंटरनेट शटडाउन की घटनाओं में वृद्धि।
2016 राजदेव रंजन (हिन्दुस्तान) की गोली मारकर हत्या। संवेदनशील रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों पर कई FIR। प्रशासन द्वारा इंटरनेट सेवाएँ बंद करने की घटनाएँ बढ़ीं।
2017 गौरी लंकेश की हत्या। आलोचनात्मक रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों पर कई आपराधिक मामले। सांप्रदायिक तनाव वाले क्षेत्रों में इंटरनेट प्रतिबंध।
2018 शुजात बुखारी, संदीप शर्मा की हत्या। आसिफ़ सुल्तान की UAPA के तहत गिरफ्तारी। जम्मू-कश्मीर में बार-बार इंटरनेट बंद।
2019 स्थानीय पत्रकारों पर हमले जारी। काज़ी शिब्ली गिरफ्तार। अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में लंबा इंटरनेट शटडाउन।
2020 शुभम मणि त्रिपाठी की हत्या। सिद्धीक़ कप्पन, राजीव शर्मा गिरफ्तार; कोविड रिपोर्टिंग से जुड़े कई पत्रकारों पर FIR। कई क्षेत्रों में इंटरनेट प्रतिबंध जारी।
2021 किसान आंदोलन की कवरेज के दौरान पत्रकारों पर हमले व मुकदमे। सोशल मीडिया पोस्ट और रिपोर्टिंग को लेकर कई FIR। किसान आंदोलन के दौरान कई जिलों में मोबाइल इंटरनेट बंद।
2022 स्थानीय पत्रकारों पर हमले जारी। फ़हद शाह, रूपेश कुमार सिंह सहित कई पत्रकार UAPA के तहत गिरफ्तार। कई राज्यों में इंटरनेट प्रतिबंधों पर अंतरराष्ट्रीय आलोचना।
2023 विभिन्न राज्यों में पत्रकारों पर हमले। NewsClick पर छापे, प्रबीर पुरकायस्थ की गिरफ्तारी। 116 इंटरनेट शटडाउन (Access Now के अनुसार)।
2024 चुनावी वर्ष में धमकी और हमलों की शिकायतें। विभिन्न पत्रकारों एवं मीडिया संस्थानों पर जांच एजेंसियों की कार्रवाई। 84 इंटरनेट शटडाउन (Access Now के अनुसार)।
2025 स्थानीय पत्रकारों पर हमले जारी। लंबी न्यायिक हिरासत वाले मामलों पर अंतरराष्ट्रीय चिंता। 65 इंटरनेट शटडाउन (Access Now के अनुसार)।
2026 पत्रकारों पर हमलों के कुछ मामलों पर अंतरराष्ट्रीय चिंता। इरफ़ान मेहराज सहित कुछ मामलों में लंबी प्री-ट्रायल हिरासत पर सवाल। 2012 से भारत में 900+ इंटरनेट शटडाउन दर्ज होने की बात विभिन्न रिपोर्टों में कही गई; पत्रकारिता पर प्रभाव को लेकर बहस जारी।

 

 

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