कलायत में एक घंटे की बारिश से जलभराव बाढ़ प्रबंधन पर उठे सवाल, जिला प्रशासन की तैयारियों की खुली पोल

www.atalhind.com9 July 20265 min read0 viewsकैथल
कलायत में एक घंटे की बारिश से जलभराव बाढ़ प्रबंधन पर उठे सवाल, जिला प्रशासन की तैयारियों की खुली पोल

बाढ़ प्रबंधन में जिला कैथल प्रशासन बेनकाब,एक घंटे की बरसात ने कलायत को पानी पानी कर दिया

कलायत की सड़कों, गलियों और बाजारों में बरसाती पानी के हिलोरे दावों की चमक कागजों तक!जनता फिर बदहाली के हवाले

नेशनल हाईवे बाईपास पर उपमंडल मुख्यालय भवन की दीवार के पास कई फीट पानी जमा हैं। सवाल यह कि जब प्रशासनिक भवन ही सुरक्षित नहीं तो आमजन का हाल कौन पूछेगा?

कलायत /9 जुलाई 2026 / अटल हिन्द ब्यूरो /तरसेम सिंह

कलायत में मात्र करीब एक घंटे की बरसात ने जिला प्रशासन के कथित बाढ़ प्रबंधन की पूरी पोल खोलकर रख दी। जिन दावों को अधिकारी मानसून से पहले मीडिया और आम जनता के सामने ठोस तैयारी के रूप में प्रस्तुत कर रहे थे। वे दावे बरसाती पानी की पहली गंभीर परीक्षा में ही बहते नजर आए। शहर की सड़कों, गलियों, बाजारों और आवासीय बस्तियों में जलभराव ने यह साफ कर दिया कि बाढ़ प्रबंधन के नाम पर योजनाएं कम और कागजी भरोसे ज्यादा दिए गए।

आखिर यह कैसी तैयारी है कि हर वर्ष वही गलियां डूबती हैं, वही बाजार जलमग्न होते हैं। वही लोग अपने घरों, दुकानों और रोजी रोटी को पानी में घिरा हुआ देखने को मजबूर होते हैं? क्या कलायत की जनता का कसूर केवल इतना है कि वह हर मानसून में प्रशासनिक लापरवाही का दंश झेलती रहे और फिर अगले वर्ष वही पुराने आश्वासन सुनती रहे?

नगरपालिका, जन स्वास्थ्य विभाग, सिंचाई विभाग, पंचायती राज और अन्य संबंधित विभागों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। शहर की गलियों के नीचे दफन सीवर मैनहोल, जंगली वनस्पति से बुरी तरह अटे सिंचाई संसाधन, अवरुद्ध नाले और बंद पड़े पानी निकासी मार्ग इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि धरातल पर तैयारी नाम की कोई चीज दिखाई नहीं देती। यदि सफाई, निकासी और बाढ़ प्रबंधन पर सरकारी धन खर्च हुआ है तो उसका असर जमीन पर क्यों नहीं दिख रहा? यदि कार्य हुए हैं तो पानी क्यों ठहरा? यदि कार्य नहीं हुए, तो बिल किस आधार पर बने?

जनता के बीच यह आरोप तेजी से उठ रहे हैं कि बाढ़ प्रबंधन और सफाई कार्यों के नाम पर फर्जी बिलिंग के माध्यम से सरकार को मोटा चूना लगाया गया। यह आरोप केवल राजनीतिक बयानबाजी मानकर खारिज नहीं किए जा सकते। क्योंकि जब सड़कें पानी से भरती हैं नाले बंद मिलते हैं। सीवर व्यवस्था गायब दिखती है और निकासी मार्ग जाम पड़े होते हैं। तब सवाल स्वाभाविक रूप से सरकारी खर्च और विभागीय जवाबदेही पर ही उठते हैं।

कलायत की सड़कों, गलियों और बाजारों में बरसाती पानी के हिलोरे दावों की चमक कागजों तक! जनता फिर बदहाली के हवाले
कलायत की सड़कों, गलियों और बाजारों में बरसाती पानी के हिलोरे दावों की चमक कागजों तक!
जनता फिर बदहाली के हवाले

रेलवे रोड, कैंची चौक और अन्य कई क्षेत्रों में जलभराव ने नगर व्यवस्था की असल तस्वीर सामने रख दी है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि जल निकासी के लिए नालों के पुनर्निर्माण और समुचित ड्रेनेज सिस्टम का कोई ठोस व दीर्घकालिक खाका कभी गंभीरता से तैयार ही नहीं किया गया। हर बार अस्थायी उपाय, औपचारिक निरीक्षण, बयानबाजी और फाइलों में बंद योजनाओं से काम चलाया गया। परिणाम आज पूरे शहर के सामने है।

राजनीतिक दृष्टि से भी कलायत की यह समस्या किसी एक दल या एक कार्यकाल तक सीमित नहीं रही। सत्ता में भाजपा भी रही। दावे हुए पर परिणाम शून्य रहा। अब कांग्रेस के दौर में भी आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला जारी है। मगर जनता को बहस नहीं समाधान चाहिए। लोगों को यह जानना है कि आखिर उनके घरों और बाजारों को हर साल बरसाती पानी के हवाले क्यों कर दिया जाता है?

आखिर क्यों प्रशासन समस्या को बीमारी की जड़ से पकड़ने की बजाय हर बार मरहम पट्टी जैसी औपचारिक कार्रवाई तक सीमित रहता है ?
समाजसेवी संगठनों ने अब जलभराव की ग्राउंड रिपोर्ट तैयार करने के लिए फोटो और वीडियोग्राफी शुरू कर दी है । ताकि मुख्यमंत्री तक वास्तविक स्थिति पहुंचाई जा सके। यह कदम अपने आप में प्रशासनिक तंत्र के लिए चेतावनी है। जब जनता को अपनी पीड़ा प्रमाणों के साथ सत्ता के सर्वोच्च स्तर तक पहुंचानी पड़े तो समझ लेना चाहिए कि स्थानीय व्यवस्था जनता का विश्वास खो चुकी है।

यह मामला केवल पानी भरने का नहीं है। यह प्रशासनिक जवाबदेही, सरकारी धन के उपयोग, विभागीय ईमानदारी और जनजीवन की गरिमा से जुड़ा सवाल है। बरसाती पानी के ये हिलोरे केवल गलियों में नहीं उठ रहे। बल्कि जनता के भीतर जमा आक्रोश को भी हिला रहे हैं। कलायत के लोग खैरात नहीं मांग रहे। वे अपना हक मांग रहे हैं। वे चाहते हैं कि उनके घर, बाजार, दुकानें और गलियां हर वर्ष प्रशासनिक लापरवाही की प्रयोगशाला न बनें।

यदि समय रहते इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं किया गया यदि जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं हुई यदि फर्जी बिलिंग और कागजी कार्यों की निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो प्रशासन को आने वाले दिनों में बड़े जनाक्रोश का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा। इतिहास गवाह है कि जब बेबस, मजलूम और आर्थिक रूप से चोट खाए लोग सड़कों पर उतरते हैं तो बड़ी से बड़ी सल्तनतों के ताज और तख्त हिल जाते हैं।

कलायत की जनता समाधान चाहती है। सिर्फ बयान नहीं। धरातल पर काम चाहती है। सिर्फ कागजी दावे नहीं। जवाबदेही चाहती है। सिर्फ निरीक्षणों की औपचारिकता नहीं।
यहां डॉ राजिंदर छाबड़ा का सवाल सीधा है क्या जिला प्रशासन कलायत को हर मानसून में डूबता देखने की आदत डाल चुका है या इस बार वास्तव में व्यवस्था की नींव तक जाकर जवाबदेही तय करेगा?

Share:

Comments

Leave a comment