पेड़ की पुकार एक स्वप्न जिसने प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी का एहसास कराया

www.atalhind.com3 June 20263 min read0 viewsसाहित्य
पेड़ की पुकार  एक स्वप्न जिसने प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी का एहसास कराया
पेड़ की अभिलाषा पेड़ की पुकार
— एक स्वप्न, एक संदेश
लेखक : प्रदीप जागलान 'बैरागी'
लेखक : प्रदीप जागलान ‘बैरागी’

रात को मैं एक लंबी यात्रा करके घर पहुँचा। शरीर थका हुआ था, इसलिए भोजन करते ही बिस्तर पर लेट गया। कब आँख लग गई, इसका मुझे पता ही न चला। नींद में मुझे एक विचित्र स्वप्न दिखाई दिया।

मैं प्रतिदिन की भाँति प्रातःकाल सैर के लिए निकला था। शहर की गलियों से गुजरते हुए पार्क की ओर जा रहा था। रास्ते में मिलने वाले बुजुर्गों को राम-राम करता और उनके स्नेहपूर्ण अभिवादन का उत्तर देता जाता। उसी गली में एक पेड़ भी था, जिसे मैं वर्षों से देखता आ रहा था। उसकी घनी छाया और हरी-भरी पत्तियाँ मन को बड़ी शांति देती थीं। ऐसा लगता था मानो वह मौन रहकर भी सबको आशीर्वाद दे रहा हो।

उस दिन मैं कुछ जल्दी में था। तेज कदमों से आगे बढ़ रहा था कि अचानक पीछे से किसी के पुकारने की आवाज सुनाई दी—

“सुनिए…!”

मैंने मुड़कर देखा, लेकिन कोई दिखाई नहीं दिया। कुछ कदम आगे बढ़ा ही था कि फिर वही आवाज सुनाई दी। इस बार मेरी नजर उस पेड़ पर पड़ी। उसकी शाखाएँ झुकी हुई थीं और वह कुछ उदास दिखाई दे रहा था। मुझे ऐसा लगा मानो वही मुझे बुला रहा हो।

मैं उसके पास रुक गया।

पेड़ ने धीमी आवाज में कहा, “मित्र, आज मेरा मन बहुत दुखी है।”

मैंने आश्चर्य से पूछा, “क्या बात है? तुम तो हमेशा लोगों को छाया, हरियाली और ताजगी देते हो। फिर दुखी क्यों हो?”

पेड़ बोला, “मेरे मालिक ने मुझे बड़े प्रेम से लगाया था। मैं भी उनके स्नेह से बहुत प्रसन्न था। लेकिन जब उन्होंने अपना मकान बनाया, मेरे लिए घर में थोड़ी-सी जगह भी नहीं रखी औरमुझे गली में ही लगा दिया।”

कुछ क्षण रुककर वह फिर बोला, “शुरू में मुझे लगा कि कोई बात नहीं, मैं यहीं रहकर लोगों की सेवा करूँगा। लेकिन धीरे-धीरे लोग मुझे परेशानी समझने लगे। कोई वाहन मेरी शाखाओं से टकरा जाता है, कोई मुझे दोष देता है कि मैं रास्ता रोक रहा हूँ। आज एक ट्रैक्टर ने मुझे जोरदार टक्कर मार दी। मेरी कई शाखाएँ टूट गईं और चालक ने उल्टा मुझे ही बुरा-भला कहा।”

उसकी बातें सुनकर मेरा हृदय द्रवित हो गया।

पेड़ आगे बोला, “मैं किसी का बुरा नहीं चाहता। मैं तो केवल छाया, स्वच्छ हवा और हरियाली देना चाहता हूँ। लेकिन काश! मेरे मालिक ने मकान बनाते समय मेरे लिए घर के अंदर थोड़ी-सी जगह छोड़ दी होती। तब मैं भी सम्मान के साथ बढ़ता और किसी के रास्ते में बाधा भी न बनता।”

उसकी बात सुनकर मैं गहरे विचार में पड़ गया। सचमुच, पेड़-पौधे लगाना पुण्य का कार्य है, लेकिन उन्हें उचित स्थान देना भी उतना ही आवश्यक है।

तभी पेड़ ने मानो मुझे एक संदेश दिया—

“हर व्यक्ति को अपने घर का निर्माण करते समय प्रकृति के लिए भी स्थान अवश्य छोड़ना चाहिए। पेड़-पौधे हमारे जीवन का आधार हैं, लेकिन उन्हें इस प्रकार लगाना चाहिए कि वे सुरक्षित भी रहें और दूसरों को असुविधा भी न हो।”

उसकी बात सुनकर मैं मुस्कुराया और मन ही मन उससे सहमत हो गया।

मानो मेरी सहमति पाकर पेड़ की पत्तियाँ हवा में धीरे-धीरे लहराने लगीं। उसकी उदासी कहीं खो गई थी और वह फिर से प्रसन्न दिखाई देने लगा।

तभी मेरी आंख खुल गई मेरे मन में यही विचार चलता रहा कि केवल पेड़ लगाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें सम्मानपूर्वक बढ़ने का स्थान देना भी हमारी जिम्मेदारी है।

उसके बाद जब भी मैं उस गली से गुजरता, उस पेड़ को देखकर मेरे मन में प्रकृति के प्रति प्रेम, जिम्मेदारी और दूरदर्शिता की भावना जाग उठती।

वह पेड़ अब केवल एक पेड़ नहीं था, बल्कि जीवन का एक संदेश बन चुका था।

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