भारत की खराब अदालती न्याय व्यवस्था से परेशान हुई जनता

www.atalhind.com14 July 20263 min read0 viewsदिल्ली
भारत की खराब अदालती न्याय व्यवस्था से परेशान हुई  जनता

 

कोर्ट रूम में महिला ने उतारा मंगलसूत्र, रोते हुए बोली- ’15 साल से न्याय का इंतजार, परिवार बर्बाद हो गया’

नई दिल्ली/13 जुलाई 2026 /अटल हिन्द ब्यूरो/एजेंसी

सुप्रीम कोर्ट के गलियारों में सोमवार को एक बेहद भावुक और दिल पसीजने वाला नजारा देखने को मिला। सहारा इंडिया की संपत्तियों की बिक्री और उससे जुड़े कानूनी विवाद की सुनवाई के दौरान हैदराबाद से आई एक महिला न्याय की गुहार लगाते हुए इतनी हताश हो गई कि उसने कोर्ट रूम में ही अपना मंगलसूत्र उतार दिया।

जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने रोते हुए महिला ने अपील की कि 15 साल से चल रहे इस मुक़दमे ने उसके परिवार को पूरी तरह से तबाह कर दिया है। महिला की इस मार्मिक अपील के बाद अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अगले सोमवार को स्पेशल बेंच में सुनवाई का आदेश दिया है।

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15 साल के इंतजार ने तोड़ी कमर
महिला ने अदालत को बताया कि पिछले डेढ़ दशक से उसका परिवार एक सामान्य जीवन जीने के लिए तरस गया है। सालों से चल रही इस लंबी कानूनी लड़ाई के कारण उनकी आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय हो चुकी है। रुंधे गले से अपनी आपबीती सुनाते हुए महिला ने कहा:

“हुजूर, हम सब मिलकर आपसे हाथ जोड़कर गुजारिश कर रहे हैं, हमारा मामला सुन लीजिए। आज नौबत यहां तक आ गई है कि हम अपने बच्चों को दो वक्त का खाना तक नहीं खिला पा रहे हैं, ऐसे में उनकी पढ़ाई-लिखाई के बारे में तो सोचना भी बहुत दूर की बात है।”

कोर्ट ने दिया ढाढस और दी ऑनलाइन पेशी की सलाह
महिला के इस दर्द को सुनने के बाद जस्टिस सूर्यकांत ने उन्हें सांत्वना दी और न्याय का भरोसा दिलाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि अदालत उनकी परेशानी को समझ रही है। आर्थिक तंगी का सामना कर रही इस महिला को कोर्ट ने सलाह दी कि वह हैदराबाद से दिल्ली तक आने-जाने की यात्रा पर अपना पैसा बर्बाद न करें और अगले हफ्ते होने वाली सुनवाई में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (ऑनलाइन माध्यम) के जरिए शामिल हों।

हालांकि, महिला ने न्यायाधीश की ऑनलाइन पेश होने की सलाह को विनम्रता से स्वीकार नहीं किया। उसने दृढ़ता के साथ कहा, “नहीं सर, हम खुद आएंगे, क्योंकि हमारा पूरा परिवार बर्बाद हो चुका है।”

न्याय प्रणाली में देरी और आम जनता का आक्रोश
यह घटना भारतीय न्याय व्यवस्था में मुकदमों के लंबे समय तक लंबित (पेंडिंग) रहने की गंभीर समस्या को एक बार फिर रेखांकित करती है। कानूनी जानकारों और आम जनता का मानना है कि तारीख-पर-तारीख मिलने की इस प्रक्रिया से वादियों का न केवल मानसिक और आर्थिक उत्पीड़न होता है, बल्कि व्यवस्था पर से उनका भरोसा भी डगमगाने लगता है।

हाल के दिनों में देश की विभिन्न अदालतों से ऐसी कई तस्वीरें और तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं, जहां याचिकाकर्ताओं ने जजों और वकीलों के सामने लंबी खिंचती बहसों पर अपना रोष व्यक्त किया है। सहारा मामले में महिला का यह कदम इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अब आम जनता के सब्र का बांध टूट रहा है और न्याय प्रक्रिया में त्वरित सुधारों तथा जजों की जवाबदेही तय करने की मांग तेज होती जा रही है।

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