सिलीगुड़ी कॉरिडोर: 1947 की रणनीतिक भूल, 1971 का छूटा अवसर और 2026 का संभावित समाधान

www.atalhind.com19 May 20269 min read0 viewsभारत
सिलीगुड़ी कॉरिडोर: 1947 की रणनीतिक भूल, 1971 का छूटा अवसर और 2026 का संभावित समाधान

अंततः, भारत का चिकन नेक हिल रहा है
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री द्वारा 120 एकड़ जमीन केंद्र को हस्तांतरित करने से भारत के सबसे संवेदनशील गलियारे में लंबित रणनीतिक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में आखिरकार तेजी आ सकती है

 

लेखक–गुरपताप मान

 

 

 

 

 

 

 

 

लेखक–गुरपताप मान सिंह ने लिखा है जिसका हमने राज कुमार अग्रवाल ने हिंदी अनुवाद किया है।

 

सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे सामान्यतः भारत की “चिकन नेक” अर्थात “मुर्गे की गर्दन” कहा जाता है, केवल उत्तर बंगाल की एक संकरी भूमि-पट्टी भर नहीं है। अपने सबसे संकरे हिस्से में मात्र 20 से 22 किलोमीटर चौड़ा यह भूभाग भारत की मुख्य भूमि को पूर्वोत्तर भारत से जोड़ने वाली एकमात्र स्थलीय जीवनरेखा है। इसी मार्ग के माध्यम से 5 करोड़ 20 लाख से अधिक नागरिकों और लगभग 2,62,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले पूर्वोत्तर भारत का देश के बाकी हिस्सों से संपर्क बना रहता है।

पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा लगभग 120 एकड़ भूमि केंद्र सरकार को हस्तांतरित किए जाने से अब भारत के इस अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र में वर्षों से लंबित रणनीतिक अवसंरचना परियोजनाओं को गति मिलने की संभावना बनी है।

इस नाजुक भू-मार्ग के अतिरिक्त पूरा पूर्वोत्तर भारत वस्तुतः चारों ओर से सीमित है—व्यापार के दृष्टिकोण से बाधित, आवागमन के लिए निर्भर और सामरिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील।

विश्व राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाने की आकांक्षा रखने वाला कोई भी बड़ा राष्ट्र स्वेच्छा से ऐसे संकरे मार्ग पर निर्भर नहीं रहना चाहेगा, जो कई महानगरों की उपनगरीय सड़कों से भी संकरा हो और जिसके माध्यम से उसके विशाल सीमांत क्षेत्र का संपर्क बना रहे। किंतु दुर्भाग्य से यही वह भौगोलिक कमजोरी थी, जो भारत को विरासत में मिली और जिसे दशकों तक पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया गया।

1947: स्वतंत्र भारत की आधारभूत रणनीतिक त्रुटि

भारत की पहली बड़ी सामरिक भूल विभाजन की प्रक्रिया में ही निहित थी।

जब रेडक्लिफ रेखा के माध्यम से भारत और पाकिस्तान की सीमाएँ निर्धारित की गईं, तब ऐसा प्रतीत होता है कि पूर्वोत्तर भारत की दीर्घकालिक भौगोलिक और रणनीतिक आवश्यकताओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। पूर्वी पाकिस्तान का निर्माण इस प्रकार हुआ कि भारत के पास अपने विशाल पूर्वोत्तर क्षेत्र तक पहुँचने के लिए केवल एक अत्यंत संकरा भूभाग ही बचा।

यह मात्र भू-सीमा का समझौता नहीं था, बल्कि स्वतंत्र भारत की संरचना में निहित एक गंभीर रणनीतिक कमजोरी थी।

पूर्वोत्तर के लिए कोई सुरक्षित समुद्री मार्ग सुनिश्चित नहीं किया गया। कोई वैकल्पिक स्थलीय संपर्क व्यवस्था नहीं बनाई गई। परिणामस्वरूप एक विशाल सीमांत क्षेत्र को मात्र 22 किलोमीटर चौड़े मार्ग पर निर्भर छोड़ दिया गया।

विभाजन अवश्य ही अत्यंत जटिल और अराजक परिस्थितियों में हुआ था, परंतु ऐसे ही समय में दूरदर्शी रणनीतिक सोच की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। दुर्भाग्यवश भारत को एक ऐसा भौगोलिक दांव विरासत में मिला, जिसका बोझ आने वाली पीढ़ियों को उठाना पड़ा।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर में भूमिगत रेल परियोजना और रणनीतिक अवसंरचना विकास, जो पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा और कनेक्टिविटी को मजबूत करेगा।
सिलीगुड़ी कॉरिडोर में भूमिगत रेल परियोजना और रणनीतिक अवसंरचना विकास, जो पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा और कनेक्टिविटी को मजबूत करेगा।

1971: ऐतिहासिक विजय, परंतु रणनीतिक अवसर का अपूर्ण उपयोग

यदि 1947 ने यह कमजोरी उत्पन्न की, तो 1971 ने इसे दूर करने का एक असाधारण अवसर प्रदान किया।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में भारत ने अपने इतिहास की सबसे निर्णायक सैन्य विजय प्राप्त की। फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ और लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के नेतृत्व में भारतीय सेना ने पाकिस्तान के पूर्वी भाग को अलग कर बांग्लादेश के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।

यह भारत की अधिकतम रणनीतिक क्षमता और प्रभाव का क्षण था।

ढाका राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य दृष्टि से नई दिल्ली पर निर्भर था। यदि कभी ऐसा अवसर था जब भारत चटगांव बंदरगाह तक स्थायी समुद्री पहुँच, सुनिश्चित पारगमन अधिकार या सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर निर्भरता कम करने वाली दीर्घकालिक व्यवस्थाएँ सुनिश्चित कर सकता था, तो वह यही समय था।

लेकिन 1972 की भारत-बांग्लादेश संधि ने भू-रणनीतिक पुनर्संरचना के बजाय सद्भावना को प्राथमिकता दी।

सैन्य विजय को संस्थागत रूप दिया गया, किंतु भौगोलिक कमजोरी यथावत बनी रही।

विलंब की कीमत

आज प्रतिदिन हजारों ट्रक, ईंधन टैंकर, रक्षा आपूर्ति वाहन और आवश्यक वस्तुओं से भरे भारी वाहन इसी कॉरिडोर से गुजरते हैं। पूर्वोत्तर भारत के लिए जाने वाली अधिकांश पेट्रोलियम पाइपलाइनें, फाइबर नेटवर्क, विद्युत पारेषण लाइनें और माल परिवहन प्रणाली इसी मार्ग पर निर्भर हैं।

यद्यपि इस क्षेत्र में अनेक सड़क और रेल संपर्क मौजूद हैं, फिर भी संपूर्ण प्रणाली अत्यधिक केंद्रीकृत और प्राकृतिक चुनौतियों से घिरी हुई है। बाढ़ प्रभावित मैदान, सिलीगुड़ी के आसपास शहरी यातायात दबाव, दार्जिलिंग और सिक्किम की ओर जाने वाले संकरे पहाड़ी मार्ग, भूस्खलन और प्रतिकूल मौसम इस संपर्क की नाजुकता को बार-बार उजागर करते हैं।

सामरिक दृष्टि से यह कॉरिडोर चीन की चुम्बी घाटी के अत्यंत निकट स्थित है। यह कीलनुमा भूभाग सीधे इस संकरी जीवनरेखा की ओर बढ़ता है। वर्ष 2017 के डोकलाम गतिरोध ने स्पष्ट कर दिया कि “चिकन नेक” केवल आर्थिक संपर्क मार्ग नहीं, बल्कि भारत की सबसे संवेदनशील रणनीतिक धमनियों में से एक है।

भारत की चिकन नेक कहलाने वाला सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जो पूर्वोत्तर भारत को मुख्य भूमि से जोड़ने वाली सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक सड़क है।

वर्षों से विशेषज्ञ यह चेतावनी देते रहे कि इस क्षेत्र में अवसंरचना को तत्काल सुदृढ़ करने और समन्वित राष्ट्रीय योजना की आवश्यकता है। इसके बावजूद, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पूर्व राज्य सरकार और केंद्र के बीच भूमि हस्तांतरण तथा प्रशासनिक मतभेदों के कारण कई महत्वपूर्ण परियोजनाएँ लंबे समय तक अटकी रहीं।

रिपोर्टों के अनुसार लगभग 490 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्गों के चौड़ीकरण और रणनीतिक उन्नयन से जुड़ी परियोजनाएँ, जिनकी अनुमानित लागत 25,000 से 26,000 करोड़ रुपये थी, महीनों तक लंबित रहीं। इनमें निम्नलिखित अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग शामिल थे—

सिक्किम की ओर जाने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग 10,
भूटान सीमा की दिशा में हासीमारा–जयगांव मार्ग,
सिलीगुड़ी–दार्जिलिंग संपर्क,
तथा “चिकन नेक” क्षेत्र से सीधे जुड़े अनेक अन्य राजमार्ग खंड।

सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था में ऐसे विलंब को नौकरशाही अक्षमता माना जा सकता है, किंतु सिलीगुड़ी कॉरिडोर जैसे क्षेत्र में इसका सीधा संबंध राष्ट्रीय सुरक्षा से है।

किसी सरकार का उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा को कमजोर करना न भी हो, फिर भी भारत के सबसे संवेदनशील भूभागों में रणनीतिक अवसंरचना को प्राथमिकता न देना दूरदर्शिता की गंभीर कमी को दर्शाता है।

इसी कारण लगभग 120 एकड़ भूमि और कई महत्वपूर्ण राजमार्ग खंडों का भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) और राष्ट्रीय राजमार्ग एवं अवसंरचना विकास निगम लिमिटेड (NHIDCL) जैसी केंद्रीय एजेंसियों को हस्तांतरण एक संभावित परिवर्तनकारी कदम माना जा रहा है।

सुधार का निर्णायक क्षण: रणनीतिक लचीलापन का निर्माण

स्वतंत्रता के बाद पहली बार ऐसा प्रतीत हो रहा है कि भारत सिलीगुड़ी कॉरिडोर को केवल परिवहन क्षेत्र नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र के रूप में देख रहा है।

इस प्रयास का केंद्रीय तत्व टिनमाइल हाट से रंगापानी होते हुए बागडोगरा तक प्रस्तावित भूमिगत रेल मार्ग है। इस परियोजना के अंतर्गत लगभग 35 से 40 किलोमीटर लंबी सुदृढ़ रेल संरचना विकसित की जाएगी, जिसमें शामिल होंगे—

दो भूमिगत रेल लाइनें,
चार उन्नत सतही ट्रैक,
आधुनिक सिग्नल प्रणाली,
तथा ऐसी बहुस्तरीय संरचना, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी नागरिक और सैन्य आपूर्ति को निर्बाध बनाए रख सके।

यह सामान्य रेल विस्तार नहीं, बल्कि रणनीतिक अभियांत्रिकी का उत्कृष्ट उदाहरण है।

भूमिगत रेल मार्ग तोड़फोड़, सिग्नल अवरोध और हवाई हमलों की संभावित आशंकाओं को कम करते हैं। समानांतर ट्रैक किसी एक बिंदु पर विफलता के जोखिम को घटाते हैं।

इसके साथ ही भारतमाला परियोजना के अंतर्गत एक्सप्रेसवे, गोरखपुर–सिलीगुड़ी ग्रीनफील्ड कॉरिडोर, असम में आपातकालीन लैंडिंग सुविधाएँ, पुनर्जीवित हवाई पट्टियाँ तथा म्यांमार के माध्यम से कालादान बहु-माध्यम परिवहन परियोजना पूर्वोत्तर भारत के लिए वैकल्पिक संपर्कों की अनेक परतें तैयार कर रही हैं।

यह व्यापक पहल प्रधानमंत्री Narendra Modi और भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की उस रणनीतिक सोच को दर्शाती है, जिसमें अवसंरचना को केवल विकास व्यय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक एकीकरण और भू-राजनीतिक स्थिरता के उपकरण के रूप में देखा जा रहा है।

1947 के बाद पहली बार भारत इस संरचनात्मक कमजोरी को केवल संभालने के बजाय उसे मूल रूप से सुधारने की दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है।

रणनीतिक संतुलन की पुनर्स्थापना

1947 ने कमजोरी पैदा की।
1971 उसे दूर नहीं कर सका।
और 2026 संभवतः उस ऐतिहासिक त्रुटि के व्यवस्थित समाधान की शुरुआत बन सकता है।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर केवल उत्तर बंगाल की एक संकरी भूमि-पट्टी नहीं है। यह भारत की सामरिक इच्छाशक्ति, राजनीतिक दूरदर्शिता और राष्ट्रीय एकता की वास्तविक परीक्षा है। यदि वर्तमान प्रयास समयबद्ध और प्रभावी रूप से पूरे होते हैं, तो यह न केवल पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा को मजबूत करेगा, बल्कि स्वतंत्र भारत की सबसे पुरानी भौगोलिक कमजोरी को स्थायी रूप से कम करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम सिद्ध होगा।

 

 

यह लेख अंग्रेज़ी में लेखक Gurpatap Mann Singh द्वारा लिखा गया है, जिसका हिंदी अनुवाद Raj Kumar Agrawal ने किया है।

मूलरूप से अंग्रेज़ी में प्रकाशित इस विस्तृत विश्लेषणात्मक लेख को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें:
Finally India’s Chicken’s Neck Is Moving – Gurpatap Mann Singh

Share:

Comments

Leave a comment