जो बच जाते हैं, वे अक्सर जीवित लाश बनकर रह जाते हैं

Atal Hind16 October 20255 min read0 viewsराजस्थान
जो बच जाते हैं, वे अक्सर जीवित लाश बनकर रह जाते हैं

घाव जो दिखते नहींपर जीने नहीं देते

मन के मलबे तले दबे लोग: एक अदृश्य महामारी की सच्चाई

अदृश्य युद्ध के सैनिक: आघात से जूझती मानवता की पुकार

जब एक सामान्य सुबह अचानक खून और चीखों में डूब जाती है, जब हँसी की गूँज दहशत में बदल जाती है, और दुनिया का हर कोना युद्धक्षेत्र सा प्रतीत होता है, तब आघात अपना विकराल रूप प्रकट करता है।यह केवल शारीरिक चोट नहीं, बल्कि एक ऐसी आंधी है जो आत्मा को चीरती हुई मन की गहराइयों में उतर जाती है, जहाँ से निकलना लगभग असंभव सा लगता है। हर साल 17 अक्टूबर को विश्व आघात दिवस हमें इस कठोर सत्य से रूबरू कराता है कि आघात सिर्फ दुर्घटनाओं या हिंसा का परिणाम नहीं, बल्कि एक ऐसी अदृश्य महामारी है जो चुपके-चुपके लाखों ज़िंदगियों को निगल लेती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization)के अनुसार, हर साल लगभग 50 लाख लोग सड़क हादसों, युद्धों, प्राकृतिक आपदाओं और हिंसा की भेंट चढ़ते हैं। जो बच जाते हैं, वे अक्सर जीवित लाश बनकर रह जाते हैं—पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) की चपेट में, जहाँ हर रात पुराने ज़ख्म ताज़ा होकर तड़पाते हैं।

 

 

आघात की यह दुनिया इतनी गहन और जटिल है कि हम अक्सर इसके सतही रूपों—जैसे भारत में हर घंटे होने वाली सड़क दुर्घटनाओं या युद्ध के मैदानों से लौटे सैनिकों के मन में बसी बमों की गूँज—तक ही सीमित रह जाते हैं। मगर गहराई में झाँकें तो एक और अनदेखा सच सामने आता है: अंतर-पीढ़ीगत आघात, जो पीढ़ियों तक चुपचाप फैलता रहता है। विज्ञान बताता है कि आघात डीएनए स्तर पर भी असर डाल सकता है—एपिजेनेटिक बदलावों के ज़रिए, जहाँ माता-पिता के दर्दनाक अनुभव बच्चों के जीन एक्सप्रेशन को प्रभावित करते हैं, बिना किसी प्रत्यक्ष घटना के। यह वह अनसुनी सच्चाई है जो आघात को निजी पीड़ा से सामूहिक विरासत में बदल देती है। विश्व आघात दिवस हमें यही याद दिलाता है कि हमारा दर्द अकेला नहीं, बल्कि इतिहास की गहरी जड़ों से जुड़ा है, जो हमें न केवल समझने, बल्कि सामूहिक रूप से इससे उबरने की प्रेरणा देता है।

 

 

 

भारत में आघात की चुनौतियाँ न केवल गहरी, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जटिलताओं से घिरी हैं, जो इसे और भी विकराल बनाती हैं। सांस्कृतिक कलंक और मानसिक स्वास्थ्य संसाधनों की भयावह कमी मिलकर एक घातक संकट पैदा करते हैं।सड़क हादसों की मार से लेकर घरेलू हिंसा और दहेज हत्याओं तक, ये घटनाएँ सिर्फ़ शरीर को ही नहीं चोटिल करतीं, बल्कि मन को भी खंड-खंड कर देती हैं। एक अध्ययन के अनुसार, भारत में लगभग 30% महिलाएँ घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं। बच्चों पर पड़ने वाला आघात—स्कूलों में धमकियाँ, यौन शोषण या माता-पिता की अनुपस्थिति—एक ऐसा अनछुआ क्षेत्र है, जिसके दीर्घकालिक प्रभाव विनाशकारी हैं। बाल मनोविज्ञान विशेषज्ञ बताते हैं कि बचपन का ट्रॉमा वयस्कता में हृदय रोग, मधुमेह, और यहाँ तक कि कैंसर जैसी बीमारियों का जोखिम बढ़ाता है, क्योंकि तनाव हार्मोन कोर्टिसोल का अत्यधिक स्राव प्रतिरक्षा प्रणाली को कमज़ोर कर देता है।

 

 

 

चिकित्सा विज्ञान में आघात का उपचार अब सर्जरी तक सीमित नहीं है। न्यूरोसाइंस ने खुलासा किया है कि ट्रॉमा मस्तिष्क के अमिग्डाला (भय केंद्र) को अतिसक्रिय बनाता है और हिप्पोकैंपस (स्मृति केंद्र) को सिकोड़ देता है, जिससे पीड़ित बार-बार फ्लैशबैक और दर्दनाक यादों के चक्र में फँस जाते हैं। कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (सीबीटी) जैसे पारंपरिक उपचारों के साथ-साथ, अब एमडीएमए-असिस्टेड साइकोथेरेपी जैसी नवाचारपूर्ण विधियाँ उभर रही हैं, जो नियंत्रित वातावरण में ट्रॉमा को फिर से प्रोसेस करने में मदद करती हैं। लेकिन भारत जैसे देश में ऐसी उन्नत सुविधाएँ गिने-चुने लोगों तक ही सीमित हैं। दूसरी ओर, हमारी सांस्कृतिक विरासत में योग और ध्यान जैसे प्राचीन उपाय आघात से उबरने में चमत्कारी सिद्ध हो रहे हैं। शोध बताते हैं कि प्राणायाम तनाव हार्मोन को कम करता है और मस्तिष्क की न्यूरोप्लास्टिसिटी को बढ़ाता है, जिससे दिमाग खुद को ठीक करने में सक्षम होता है। साथ ही, पशु-सहायता चिकित्सा—जैसे कुत्तों या घोड़ों के साथ इंटरैक्शन—ट्रॉमा सर्वाइवर्स में ऑक्सीटोसिन (बॉन्डिंग हार्मोन) का स्तर बढ़ाकर विश्वास और भावनात्मक स्थिरता को पुनर्जनन करती है, जैसा कि युद्धग्रस्त क्षेत्रों में देखा गया है।

 

 

 

समाज आघात रिकवरी में एक मूक लेकिन शक्तिशाली भूमिका निभाता है, जो अक्सर अनदेखी रह जाती है। ट्रॉमा-न्फॉर्म्ड केयर का वैश्विक सिद्धांत सिखाता है कि शिक्षक, पुलिस, या पड़ोसी—हर सहायक को ट्रॉमा के संकेत पहचानने और बिना आलोचना के समर्थन देने की कला सिखानी होगी। भारत में, केरल की बाढ़ या उत्तराखंड के भूकंप जैसी आपदाओं के बाद, सामुदायिक पुनर्वास ने साबित किया कि समूह कला चिकित्सा—जैसे चित्रकारी, नृत्य या कथाकथन—शब्दों के बिना दर्द को व्यक्त करने का मार्ग खोलती है। मगर एक कटु सत्य यह भी है कि लैंगिक असमानता आघात को और गहरा करती है। पुरुषों में ट्रॉमा आक्रामकता बनकर उभरता है, जबकि महिलाएँ अवसाद में डूब जाती हैं। समाज पुरुषों पर “मजबूत” बने रहने का दबाव डालता है, जिससे वे मदद माँगने से कतराते हैं।

एक और अनछुआ पहलू है जलवायु परिवर्तन और आघात का गहरा नाता। बढ़ते चक्रवात, सूखा और बाढ़ सिर्फ़ भौतिक तबाही नहीं लाते, बल्कि “इको-ट्रॉमा” जन्म देते हैं—एक ऐसी पीड़ा, जहाँ लोग अपनी जमीन, संस्कृति और पहचान खो बैठते हैं। बांग्लादेश के तटों से लेकर भारत के आदिवासी क्षेत्रों तक, यह दर्द फैल रहा है, जहाँ विस्थापन पवित्र भूमि से जुड़ी सांस्कृतिक जड़ों को उखाड़ देता है। शोध बताते हैं कि जलवायु आपदाएँ पीटीएसडी के मामलों को 30-50% तक बढ़ा देती हैं, खासकर उन समुदायों में जो अपनी विरासत खो चुके हैं।

 

 

 

विश्व आघात दिवस हमें सिखाता है कि आघात टूटना नहीं, बल्कि पुनर्जनन का अवसर है। ट्रॉमा से गुजरने वाला व्यक्ति न केवल जीवित रहता है, बल्कि अधिक करुणामय और लचीला बनकर उभरता है—सच्ची रेजिलिएंस की मिसाल। हमें शिक्षा में भावनात्मक बुद्धिमत्ता को शामिल करना होगा, अस्पतालों में मानसिक ट्रॉमा वार्ड्स स्थापित करने होंगे, और समाज से कलंक का उन्मूलन करना होगा। करुणा ही सबसे बड़ा उपचार है—जब हम किसी टूटे मन को गले लगाते हैं, तो हम अपनी समग्र मानवता को पुनर्जनन करते हैं। आघात हमें तोड़ सकता है, लेकिन समझ और समर्थन हमें और मजबूत बनाता है, एक ऐसी दुनिया की नींव रखते हुए जहाँ कोई दर्द अकेला न रहे। विश्व आघात दिवस यही वादा है: हम साथ हैं, और हम हर ज़ख्म को सहारा देंगे।

प्रो. आरके जैन अरिजीत

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